कप्तानगंज: प्रशासन की नींद कब टूटेगी? एक किलोमीटर का ‘अधूरा’ रास्ता बना हादसों का अड्डा
दो सड़कों के बीच 'लावारिस' पोखरा मार्ग; स्कूली बच्चों और राहगीरों के लिए बनी मुसीबत; कागजों में दौड़ रहा 'विकास', हकीकत में कीचड़ और गड्ढों में रेंग रही जिंदगी
अजीत मिश्रा (खोजी)
विकास की अधूरी पटकथा: बस्ती के कप्तानगंज में दो शानदार सड़कों के बीच ‘गड्ढों का नर्क’, जान जोखिम में डाल रहे हजारों राहगीर
- बस्ती: कप्तानगंज-पोखरा मार्ग की बदहाली से हजारों परेशान, मरम्मत की मांग तेज
- पीएमजीएसवाई की दो सड़कों के बीच फंसा पोखरा बाजार का एक किमी हिस्सा, प्रशासन मौन
- स्कूली बच्चों और बैंक ग्राहकों की जान जोखिम में; कब बनेगी पोखरा बाजार की जर्जर सड़क?
बस्ती। सरकारें सड़कें बनाती हैं ताकि आवागमन सुगम हो और विकास की गति तेज हो, लेकिन बस्ती जिले के कप्तानगंज ब्लॉक में विकास की तस्वीर पूरी तरह से उलट नजर आती है। यहाँ चिलमा-रामजनकी मार्ग से पोखरा होते हुए कप्तानगंज को जोड़ने वाली मुख्य सड़क पर पोखरा बाजार के पास का लगभग एक किलोमीटर का हिस्सा शासन-प्रशासन की उपेक्षा की कहानी बयां कर रहा है। यह हिस्सा दो बेहतरीन सड़कों के बीच फंसा हुआ एक ऐसा ‘गड्ढों का टापू’ बन चुका है, जो न केवल यातायात में बाधा डाल रहा है, बल्कि प्रतिदिन सैकड़ों लोगों की जान को भी जोखिम में डाल रहा है।
विकास के दावों के बीच फंसी ‘अधूरेपन’ की बेड़ी
हैरानी की बात यह है कि इस सड़क के दोनों तरफ ‘प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना’ (PMGSY) का जादू चला है। सैनिया से पोखरा चौराहा तक सड़क चकाचक है और कप्तानगंज से पोखरा बाजार तक भी सड़क का निर्माण पूर्ण हो चुका है। लेकिन, इन दोनों महत्वपूर्ण कड़ियों को जोड़ने वाला बीच का एक किलोमीटर का हिस्सा न जाने किस प्रशासनिक भूल या अनदेखी का शिकार होकर वर्षों से अधूरा पड़ा है। सड़क की यह बदहाली यह सवाल खड़ा करती है कि आखिर इतने बड़े प्रोजेक्ट में इस एक किलोमीटर के टुकड़े को कैसे छोड़ दिया गया?
विद्यार्थियों और बुजुर्गों के लिए ‘अग्निपरीक्षा’
यह जर्जर मार्ग सिर्फ एक सड़क नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण जन-सुविधा केंद्र है। इस मार्ग पर एक जूनियर हाईस्कूल और एक प्राथमिक विद्यालय स्थित हैं, जहाँ पढ़ने वाले सैकड़ों मासूम बच्चे हर दिन जान जोखिम में डालकर स्कूल तक पहुँचते हैं। इतना ही नहीं, पूर्वांचल ग्रामीण बैंक की शाखा भी इसी जर्जर सड़क के पास है, जहाँ प्रतिदिन सैकड़ों बुजुर्ग, किसान और ग्राहक काम के सिलसिले में आते हैं। बारिश के दिनों में यह सड़क कीचड़ और गंदे पानी के बड़े तालाब में बदल जाती है, जिससे पैदल चलना भी दूभर हो जाता है।
दुकानदारों की जुबानी: हादसों का अड्डा बनी सड़क
स्थानीय दुकानदार गोलू गुप्ता ने अपना दर्द साझा करते हुए बताया कि हल्की सी बारिश होते ही सड़क पर घुटनों तक पानी भर जाता है। सड़क का पता ही नहीं चलता और गड्ढों में गिरकर दुपहिया वाहन चालक रोजाना चोटिल होते हैं। वहीं, सुनील गुप्ता ने बताया कि बड़े-बड़े गड्ढे पानी के कारण छिप जाते हैं, जिससे आए दिन दुर्घटनाएं हो रही हैं। कपड़े गंदे होने और समय की बर्बादी अब स्थानीय लोगों की दिनचर्या बन गई है, जिससे उनमें गहरा आक्रोश पनप रहा है।
प्रशासन के ‘आश्वासनों का पुलिंदा’ और जमीनी हकीकत
सड़क की इस दयनीय स्थिति को लेकर जब पीडब्ल्यूडी विभाग के जेई हरीश त्रिपाठी से बात की गई, तो उनका जवाब वही पुराना घिसा-पिटा था—”प्रस्ताव पास हो चुका है और काम जल्द शुरू होगा।” लेकिन स्थानीय लोग इस ‘जल्द’ शब्द से अब थक चुके हैं। सालों से मिल रहे इन आश्वासनों के बावजूद, सड़क की स्थिति ज्यों की त्यों बनी हुई है। जनता का सवाल है कि यदि प्रस्ताव पास है, तो टेंडर की प्रक्रिया पूरी होने और काम शुरू होने में देरी क्यों हो रही है?
चेतावनी: सब्र की परीक्षा न ले प्रशासन
पोखरा बाजार के जागरूक निवासियों और राहगीरों ने प्रशासन को चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही इस मार्ग का निर्माण कार्य धरातल पर शुरू नहीं हुआ, तो मजबूरन उन्हें आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ेगा।
विकास के नाम पर हो रही यह लापरवाही न केवल सरकारी धन के सदुपयोग पर सवाल खड़ा करती है, बल्कि आम आदमी की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ भी है। क्या बस्ती प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है, या फिर यह सड़क किसी बड़ी प्रशासनिक जांच की मांग कर रही है? यह अब आने वाला समय ही बताएगा।















